Iran US War: ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार संघर्ष का स्वरूप पारंपरिक नहीं है. न तो मिसाइलें दागी जा रही हैं और न ही सैनिक आमने-सामने हैं. इसके बजाय दोनों देशों के बीच एक ऐसी जंग चल रही है, जिसे न देखा जा सकता है और न ही आसानी से मापा जा सकता है. यह जंग है मनोवैज्ञानिक युद्ध की, जिसमें शब्द, संदेश, खबरें और डर सबसे बड़े हथियार बन चुके हैं.
विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका की रणनीति यह हो सकती है कि वह बिना सैन्य कार्रवाई के ही ईरान की सत्ता व्यवस्था को कमजोर करे. इस कथित प्रयास का मकसद ईरान के भीतर असंतोष को बढ़ावा देना और नेतृत्व को दबाव में लाना बताया जा रहा है.
मनोवैज्ञानिक युद्ध का अर्थ और इतिहास
मनोवैज्ञानिक युद्ध आधुनिक संघर्षों का एक अहम हिस्सा माना जाता है. ब्रिटेनिका के अनुसार, इसमें दुश्मन देश की जनता, सेना और नेतृत्व की सोच को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है. भय, भ्रम और अविश्वास का माहौल बनाकर विरोधी को मानसिक रूप से कमजोर किया जाता है, ताकि वह खुद ही रणनीतिक भूल कर बैठे.
इतिहास में इस तरह की रणनीतियों के कई उदाहरण मिलते हैं. बेबीलोन के खिलाफ साइरस महान की रणनीति हो या एशिया में चंगेज़ खान की विजय यात्राएं, इन सबमें मनोवैज्ञानिक दबाव की बड़ी भूमिका रही. समय के साथ यह तरीका और ज्यादा परिष्कृत होता गया और अब इसमें मीडिया, सोशल नेटवर्क और कूटनीतिक बयान अहम हथियार बन चुके हैं.
ईरान के संदर्भ में अमेरिकी बयानबाज़ी
हाल के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक बयान काफी चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने ईरान की जनता से “संघर्ष जारी रखने” की अपील की. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी मदद जल्द पहुंचेगी, हालांकि मदद के स्वरूप को लेकर कोई स्पष्टता नहीं दी गई.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान ईरानी नेतृत्व के भीतर डर और असमंजस पैदा करने की कोशिश हो सकते हैं. उद्देश्य यह हो सकता है कि ईरान की सरकार दबाव में आकर कोई ऐसी गलती कर बैठे, जिससे अमेरिका को सीधे युद्ध में उतरने की जरूरत ही न पड़े.
विद्रोह के संकेत और निर्वासित नेताओं की भूमिका
इस माहौल में ईरान के पूर्व युवराज रज़ा पहलवी का बयान भी सामने आया, जिसमें उन्होंने सेना और अधिकारियों से सरकार के खिलाफ खड़े होने की अपील की. ऐसे बयान प्रतीकात्मक रूप से भले ही बड़े न लगें, लेकिन मनोवैज्ञानिक युद्ध में इनका महत्व काफी होता है. इन संदेशों के जरिए यह संकेत देने की कोशिश की जाती है कि सत्ता के खिलाफ एक वैकल्पिक नेतृत्व मौजूद है और अगर हालात बदले तो उसे समर्थन मिल सकता है.
मीडिया, सोशल मीडिया और सूचना युद्ध
ईरान को लेकर पश्चिमी मीडिया और सोशल मीडिया पर चल रही खबरें भी इस संघर्ष का अहम हिस्सा मानी जा रही हैं. कई रिपोर्ट्स में बड़े पैमाने पर मौतों और व्यापक विद्रोह की बातें कही जा रही हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि मुश्किल है.
आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि पुराने वीडियो और अप्रमाणित आंकड़ों के जरिए स्थिति को जरूरत से ज्यादा गंभीर दिखाया जा रहा है. इससे न केवल अंतरराष्ट्रीय राय प्रभावित होती है, बल्कि ईरान के भीतर भी भय और अस्थिरता का माहौल बन सकता है.
सत्ता संरचना को लेकर भ्रम
ईरान की राजनीतिक व्यवस्था को लेकर भी कई बार अधूरी या भ्रामक तस्वीर पेश की जाती है. अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अक्सर हर समस्या के लिए सुप्रीम लीडर को जिम्मेदार ठहराया जाता है, जबकि आर्थिक नीतियों और प्रशासनिक फैसलों की जिम्मेदारी राष्ट्रपति और सरकार पर होती है.
2024 के चुनावों में आर्थिक मुद्दों को ही केंद्र में रखकर ईरान की जनता ने सुधारवादी नेता मसूद पेजेशकियन को सत्ता सौंपी थी, लेकिन इस पहलू को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है.
सुरक्षा बलों के मनोबल पर दबाव
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और ज्यादा अलग-थलग करने की कोशिशों में जुटा है. ब्रिटिश मीडिया की खबरों के अनुसार, वाशिंगटन ने ब्रिटेन से IRGC को आतंकी संगठन घोषित करने की मांग की है.
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