Somnath Swabhiman Parv: पीएम मोदी ने किया जलाभिषेक, सोमनाथ मंदिर में की पूजा अर्चना

    सौराष्ट्र के विस्तृत समुद्र तट पर जब लहरें निरंतर गर्जना करती हैं, वहीं उनके साक्षी के रूप में खड़ा है भगवान शिव का प्रथम ज्योतिर्लिंग — सोमनाथ. आज सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के पावन अवसर पर इस प्राचीन धाम में भक्ति का अद्भुत दृश्य देखने को मिल रहा है.

    PM Modi in Somnath attended swabhiman parv jalabhishek
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    सौराष्ट्र के विस्तृत समुद्र तट पर जब लहरें निरंतर गर्जना करती हैं, वहीं उनके साक्षी के रूप में खड़ा है भगवान शिव का प्रथम ज्योतिर्लिंग — सोमनाथ. आज सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के पावन अवसर पर इस प्राचीन धाम में भक्ति का अद्भुत दृश्य देखने को मिल रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंदिर प्रांगण में पहुंचकर भगवान सोमनाथ का विधिवत जलाभिषेक किया और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विशेष पूजा-अर्चना में भाग लिया. यह क्षण केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया है.

    सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं है, बल्कि वह कथा है जो समय, आक्रमणों और विनाश के बाद भी बार-बार खड़ी हुई. यही कारण है कि इसे देखने और समझने के लिए दुनिया भर से श्रद्धालु और इतिहास प्रेमी यहां खिंचे चले आते हैं.

    सोमनाथ का पौराणिक आधार: जहां चंद्रमा ने फिर पाया तेज

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमनाथ को बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान प्राप्त है. इस क्षेत्र को प्राचीन काल से प्रभास तीर्थ कहा जाता रहा है. शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, चंद्रदेव को उनके ससुर प्रजापति दक्ष ने श्राप दे दिया था, जिससे उनका तेज और सौंदर्य क्षीण होने लगा. इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए चंद्रदेव ने प्रभास तीर्थ में भगवान शिव की कठोर तपस्या की. चंद्रदेव की भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें पुनर्जीवन और तेज प्रदान किया. तभी से भगवान शिव यहां “सोमनाथ” अर्थात चंद्रमा के स्वामी के रूप में पूजे जाने लगे. यही कथा इस ज्योतिर्लिंग को अन्य सभी से अलग, अधिक भावनात्मक और पौराणिक गहराई प्रदान करती है.

    इतिहास की कसौटी पर खरा उतरा सोमनाथ

    सोमनाथ मंदिर का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही संघर्षपूर्ण भी. यह मंदिर कई बार आक्रमणों में ध्वस्त हुआ, लेकिन हर बार नए आत्मबल के साथ पुनर्निर्मित किया गया. इतिहासकारों के अनुसार, यह धाम भारतीय सभ्यता की उस जिजीविषा का प्रतीक है, जो टूटकर भी हार मानने को तैयार नहीं होती. स्वतंत्र भारत में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा एक बड़ा अध्याय बना. यह मंदिर केवल धार्मिक पुनर्स्थापना नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भी प्रतीक था.

    स्थापत्य की भव्यता: जहां पत्थर भी कथा कहते हैं

    वर्तमान स्वरूप में सोमनाथ मंदिर भारतीय स्थापत्य और आधुनिक इंजीनियरिंग का अद्भुत संगम है. यह मंदिर चालुक्य शैली में निर्मित है, जिसमें प्राचीन शिल्प की सूक्ष्मता और आधुनिक संरचनात्मक मजबूती एक साथ दिखाई देती है. मंदिर का शिखर लगभग 150 फीट ऊंचा है और इसके शीर्ष पर स्थापित विशाल कलश का वजन करीब 10 टन बताया जाता है. यह कलश न केवल स्थापत्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी शिखर की पूर्णता का प्रतीक माना जाता है. मंदिर परिसर में स्वर्ण-आभा से युक्त अनेक कलश इसकी दिव्यता को और बढ़ा देते हैं. सोमनाथ मंदिर का ढांचा गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप में विभाजित है. इन तीनों हिस्सों में की गई नक्काशी भारतीय कला, पौराणिक कथाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों को जीवंत कर देती है. पत्थरों पर उकेरी गई ये आकृतियां समय के साथ संवाद करती प्रतीत होती हैं.

    समुद्र और शिव का अद्भुत संगम

    सोमनाथ की सबसे बड़ी विशेषता इसका समुद्र के किनारे स्थित होना है. मंदिर प्रांगण से दिखाई देता अथाह सागर मानो शिव की अनंतता का प्रतीक हो. लहरों की निरंतर ध्वनि और मंदिर की घंटियों का नाद मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते हैं, जो श्रद्धालुओं को ध्यान और भक्ति की गहराइयों में ले जाता है. मंदिर में प्रज्वलित अखंड ज्योति को भगवान शिव के शाश्वत स्वरूप का प्रतीक माना जाता है. यह दीपक निरंतर जलता रहता है और भक्तों के लिए आस्था की अविरल धारा बन जाता है.

    बाण स्तंभ और कपिल कुंड: रहस्य और आस्था का संगम

    सोमनाथ मंदिर परिसर में स्थित बाण स्तंभ अपनी अनोखी मान्यता के लिए जाना जाता है. दक्षिण दिशा में स्थापित इस स्तंभ पर संस्कृत में अंकित शिलालेख यह संकेत देता है कि इस बिंदु से लेकर दक्षिण ध्रुव तक पृथ्वी पर कोई भूभाग नहीं है. यह तथ्य सोमनाथ को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि भौगोलिक और खगोलीय दृष्टि से भी विशेष बनाता है. मंदिर के समीप स्थित कपिल कुंड का संबंध कपिल मुनि से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि यहां स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और आत्मिक शुद्धि का अनुभव होता है. आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन से पहले या बाद में यहां स्नान करते हैं.

    करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र

    सोमनाथ महादेव का महत्व केवल कथाओं और स्थापत्य तक सीमित नहीं है. यह मंदिर आज भी करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है. आंकड़े बताते हैं कि हर वर्ष लगभग 92 से 97 लाख श्रद्धालु सोमनाथ धाम के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं. त्योहारों और विशेष पर्वों पर यह संख्या और भी बढ़ जाती है. सोमनाथ स्वाभिमान पर्व जैसे आयोजन इस आस्था को नई ऊर्जा देते हैं. यहां आधुनिक तकनीक, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और प्राचीन परंपराएं एक साथ मिलकर यह संदेश देती हैं कि भारत अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ, लेकिन भविष्य की ओर आत्मविश्वास से बढ़ता हुआ राष्ट्र है.

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