Lohri 2026: उत्तर भारत, खासकर पंजाब और सिख समुदाय में लोहड़ी सिर्फ एक त्योहार नहीं बल्कि प्रकृति, परिश्रम और आस्था का उत्सव है. सर्दियों की विदाई और नई शुरुआत के स्वागत का यह पर्व हर साल पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है.
खुले आसमान के नीचे जलती अग्नि, ढोल की थाप, गिद्दा-भांगड़ा और लोकगीतों के बीच लोहड़ी का माहौल बेहद खास हो जाता है. लेकिन इस रंगारंग उत्सव के बीच एक सवाल अक्सर मन में आता है आखिर लोहड़ी की आग में तिल और मूंगफली ही क्यों डाली जाती है? इसके पीछे परंपरा, स्वास्थ्य और आस्था तीनों का गहरा संबंध है.
फसल और मेहनत के सम्मान का पर्व है लोहड़ी
लोहड़ी का सीधा जुड़ाव खेती और किसानों की मेहनत से है. यह पर्व रबी की फसल की कटाई और नई फसल की उम्मीदों का प्रतीक माना जाता है. लोहड़ी की अग्नि में अन्न अर्पित करना दरअसल धरती और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका है. इस अवसर पर लोग अग्नि देव की पूजा करते हैं और उनसे आने वाले साल में अच्छी पैदावार, खुशहाली और समृद्धि की कामना करते हैं. यह परंपरा बताती है कि भारतीय संस्कृति में अन्न को केवल भोजन नहीं, बल्कि जीवन का आधार माना गया है.
तिल और मूंगफली: परंपरा के साथ स्वास्थ्य का संदेश
लोहड़ी के दिन तिल और मूंगफली को अग्नि में अर्पित करने की परंपरा केवल धार्मिक नहीं है, बल्कि इसके पीछे मौसम और सेहत का भी खास कारण छिपा है.लोहड़ी के बाद मकर संक्रांति आती है, जिससे ऋतु परिवर्तन की शुरुआत मानी जाती है. इसके बाद दिन धीरे-धीरे बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं. सर्दियों के आखिरी दौर में तिल और मूंगफली जैसे खाद्य पदार्थ शरीर को गर्म रखने और ऊर्जा देने में मदद करते हैं. इस तरह लोहड़ी पर तिल-मूंगफली अर्पित करना एक तरह से यह संदेश देता है कि ठंड के मौसम में इनका सेवन करके शरीर को स्वस्थ रखा जाए.
लोकगीत, नृत्य और सामूहिक उत्सव
लोहड़ी का असली रंग तब दिखाई देता है जब परिवार, दोस्त और रिश्तेदार एक साथ अग्नि की परिक्रमा करते हैं. ढोल और नगाड़ों की गूंज के साथ गिद्दा और भांगड़ा किया जाता है, लोकगीत गाए जाते हैं और आपसी प्रेम व भाईचारे का जश्न मनाया जाता है. यह पर्व लोगों को जोड़ने, रिश्तों को मजबूत करने और सामूहिक खुशी बांटने का संदेश देता है.
भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी पौराणिक मान्यता
लोहड़ी से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है, जिसका संबंध भगवान श्रीकृष्ण से बताया जाता है. कथा के अनुसार, कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए लोहिता नाम की राक्षसी को नंदगांव भेजा था. उस समय नंदगांव में मकर संक्रांति का उत्सव मनाया जा रहा था. लोहिता ने अवसर का लाभ उठाकर श्रीकृष्ण को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सकी. अंततः श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया. मान्यता है कि इसी घटना की स्मृति में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी का पर्व मनाया जाने लगा.
आस्था, प्रकृति और जीवन का संगम
लोहड़ी 2026 केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह प्रकृति के साथ तालमेल, मेहनत के सम्मान और स्वस्थ जीवन का प्रतीक है. अग्नि में अर्पित तिल और मूंगफली हमें यह सिखाते हैं कि परंपराओं के पीछे हमेशा कोई न कोई गहरा अर्थ छिपा होता है—चाहे वह आस्था हो, सेहत हो या सामूहिक जीवन का संदेश.
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