हिमाचल के इस मेले में जमकर चलते हैं पत्थर, घायल होने पर खुश होते हैं लोग, जानें 400 साल पुरानी परंपरा की कहानी

    Himachal Pathar Mela: शिमला के निकट धामी के हलोग गांव में हर वर्ष दिवाली के अगले दिन एक अनोखा और सदियों पुराना पर्व मनाया जाता है, जिसे पत्थर मेला कहा जाता है. यह मेला मात्र एक खेल नहीं बल्कि एक गहरी धार्मिक आस्था और इतिहास का प्रतीक है, जहां पत्थरों की बारिश में खून बहाने की परंपरा निभाई जाती है.

    Halog Stone Fair in Himachal 400 Year Old Tradition of Blood Offering to Maa Kali
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    Himachal Pathar Mela: शिमला के निकट धामी के हलोग गांव में हर वर्ष दिवाली के अगले दिन एक अनोखा और सदियों पुराना पर्व मनाया जाता है, जिसे पत्थर मेला कहा जाता है. यह मेला मात्र एक खेल नहीं बल्कि एक गहरी धार्मिक आस्था और इतिहास का प्रतीक है, जहां पत्थरों की बारिश में खून बहाने की परंपरा निभाई जाती है. आइए जानते हैं इस अनोखे मेले के पीछे छुपी कहानी और इसकी विशिष्ट परंपराएं.

    पत्थरों की बारिश और रक्तसिक्त त्यौहार

    हलोग पत्थर मेला उस दिन मनाया जाता है जब गांव के लोग एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं. यह खेल तब तक चलता रहता है जब तक किसी के शरीर से खून नहीं निकलता. खून निकलते ही खेल बंद कर दिया जाता है और उस व्यक्ति को भाग्यशाली माना जाता है क्योंकि उसका खून मां काली को चढ़ाया जाता है. इस साल 60 वर्षीय सुभाष को पत्थर लगने के बाद उनके खून से मां काली का तिलक किया गया, जिन्हें यह सौभाग्यशाली अनुभव बताया गया.

    चार सौ साल पुरानी मानी जाती है परंपरा

    इस अनोखी परंपरा की शुरुआत लगभग 400 साल पहले हुई थी. इतिहास के अनुसार, धामी रियासत की रानी ने नरबलि की प्रथा को समाप्त करने के लिए खुद अपना बलिदान दिया था और सती हो गई थीं. उन्होंने कहा था कि अब कोई नरबलि नहीं दी जाएगी, बल्कि मां काली को तिलक पत्थर मेला में खून बहाकर ही किया जाएगा. तब से यह प्रथा आज तक श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जा रही है.

    जुलूस और मेले की भव्य शुरुआत

    मेले का आयोजन रानी के स्मारक रानी का चौरा में होता है. केवल पुरुषों को इस खेल में भाग लेने की अनुमति होती है, जबकि महिलाएं और बच्चे दूर से इसे देखते हैं. मेले की शुरुआत नरसिंह मंदिर से ढोल-नगाड़ों के साथ जुलूस निकालकर होती है, जो पूरे उत्सव में एक अलग ही ऊर्जा भर देता है. विभिन्न टोली जैसे कटैड़ू, तुनड़ु, दगोई, जठोटी खुंद और जमोगी खुंद एक-दूसरे के खिलाफ पत्थर फेंकती हैं.

    आस्था, इतिहास और लोक संस्कृति का संगम

    राजघराने के उत्तराधिकारी जगदीप सिंह राणा और मेले के जनरल सेक्रेटरी रणजीत सिंह कंवर बताते हैं कि यह परंपरा श्रद्धा और विश्वास से निभाई जाती है. यहां कोई भय नहीं, बल्कि सबको अपनी टोली की जीत और खुद पर पत्थर लगने की आकांक्षा रहती है. यह मेला न केवल धार्मिक आस्था बल्कि हिमाचल की लोक संस्कृति और इतिहास का अनमोल हिस्सा है.

    आधुनिकता के दौर में भी जीवित परंपरा

    आज के विज्ञान और तकनीक के युग में भी हलोग का यह पत्थर मेला अपने पुराने रूप में जीवित है. दूर-दूर से लोग इस अनोखे मेले को देखने आते हैं और इसकी धार्मिक भावना को महसूस करते हैं. यह मेला न सिर्फ एक पर्व है, बल्कि मानव आस्था की जिजीविषा और परंपरा के प्रति सम्मान का प्रतीक भी है.

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